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Sunday, December 25, 2011

(नये साल कि ख्वाहिशें )


जिंदगी के हम पे यारो, कुछ तो कम एहसान हुए,
अपनों के हाथो अपनों की महफ़िल में नीलाम हुए  

पंडित ने क्यों आँखे मुंदी ,क्यों मुल्ला नहीं चिल्लाया,
मजहब के नाम पे यारो ,जब भी कत्लेआम हुए   

मेरे नाम पे धोखा क्यों, मेरी मौत को नहीं हुआ,
वैसे तो  मेरी बस्ती में, मेरे भी हमनाम हुए 
 


उन बच्चों से जाकर पुछो, नये साल कि  ख्वाहिशें ,
भुख मिटाने मे गुम, जिनके दिन रात तमाम हुए


चरनदीप अजमानी, पिथौरा, 9993861181
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Wednesday, December 21, 2011















( जनवादी कवि अदम गोंडवी को श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा श्रध्दाजंलि )

''काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में ''

जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले देश के ख्याति प्राप्त जनवादी कवि अदम गोंडवी नही रहे। हिन्दी गजलों के ‘गजलराज’ रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी हमेशा दबे कुचले लोगों की ‘आवाज’ बने। गोंडवी लगातार समाज की तल्ख सच्चाइयों को गजल के माध्यम से लोगों के सामने रखते रहे और कागजों पर चल रही व्यवस्थाओं की पोल खोलते रहे। संवेदन हीन सरकार उनका इलाज तक नही करवा पाई। निसंदेह अदम जी का निधन साहित्य में बड़ी क्षति है। "श्रृंखला साहित्य मंच" पिथौरा द्वारा उन्हे भावभीनी श्रध्दाजंलि अर्पित की गई। श्रध्दाजंलि सभा में प्रमुख रुप से सर्वश्री पी. के. सच्चिदानंदन, एस.के.ड्ड्सेना, उमेश दीक्षित, अनुप दीक्षित, दिनेश दीक्षित, शिवा महान्ती, सन्तोष गुप्ता, एस. के. नीरज , चरनदीप अजमानी, निर्वेश दीक्षित, एफ़. ए. नन्द उपस्थित थे

Friday, December 16, 2011





सर्वप्रथम मेजर ध्यानचंद को मिले भारत रत्न  

देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न  1954 में शुरू किया गया था  तब से अब तक 41 लोगों को इससे नवाजा जा चुका है  आमतौर पर भारत-रत्न उन लोगों को मिलता है, जिनका भारत के लिए अतुलनीय और निरपेक्ष योगदान रहा है  भारत रत्न सम्मान देने के नियमो में ऐसा उल्लेख नहीं था की यह सम्मान किसी खिलाड़ी को भी दिया जा सकता है,किन्तु अब सरकार द्वारा नियमो में संशोधन के बाद यह मांग उठने लगी है की यह सम्मान क्रिकेट के भगवान् सचिन रमेश तेंदुलकर को दिया जाना चाहिए  परन्तु मै मीडिया द्वारा प्रचारित इस भावनाओं से सहमत नहीं हूँ  अगर खेल से ही किसी खिलाड़ी को भारत रत्न दिया जाना है, तो सर्वप्रथम मेजर ध्यानचंद को यह सम्मान दिया जाना चाहिए  

तीन ओलंपिक 1928, 1932 और 1936 में स्वर्ण पदक जीतने वाले करिश्माई सेंटर फारवर्ड ध्यानचंद को यह पुरूस्कार हमारे राष्ट्रीय खेल और मेजर ध्यानचंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि  होगी  उनके जन्मदिन को भारत  का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा 


सचिन से पूर्व और भी ऐसे खिलाड़ी है जो अपने खेल प्रदर्शन के दृष्टिकोण से इस सम्मान के दावेदार है  के. डी. जाधव ,लिएन्डर पेस, कर्णम मल्लेश्वरी,  राज्यवर्धन सिंग राठोर, अभिनव बिन्द्रा, सुशिल कुमार. विजेन्दर सिंग को भला हम कैसे भूल सकते है जिन्होंने ओलंपिक में पदक जीतकर भारत का नाम पुरे विश्व में फैलाया  सचिन अभी देश के लिए खेल रहे है और उनके रिटायर होने के पूर्व यह सम्मान उन्हें दिया जाना दुसरे खिलाडियो के मन में नकारात्मक सन्देश का प्रचार करेगा, जिन्होंने अपने अपने खेल के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया है 


चरनदीप अजमानी, पिथौरा 
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Monday, December 12, 2011

















( संसद हमला: शहीदों की शहादत के साथ मजाक )

13 दिसम्बर २०११ को संसद पर हमले के दस साल पूरे हो रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र की आन-बान-शान संसद भवन की आतंकी हमले से रक्षा में 9 लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी पर किसी भी सांसद पर आंच नहीं आने दी पर लगता है संसद पर हुए हमले के दौरान शहीद हुए सैनिक भुला दिये गये है हमले के बाद अफजल गुरु को इस मामले में दोषी पाया गया और उसे फांसी की सजा सुनाई गई है।
 लेकिन इस पर अमल नहीं हो सका है ,क्योंकि अफजल गुरू की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है| उसे फांसी दिलवाने की खातिर शहीदों के घर वालों ने बहादुरी के तमगे भी लौटा दिए है | फिर भी इंसाफ पाने का उनका इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ है |सुप्रीम कोर्ट से सजा की पुष्टि के बावजूद अफजल को फांसी क्यों नहीं दी जा रही है इस हमले पर अगर देश के सांसदो की जान चली गयी होती तो शायद ज्यादा अच्छा होता। दस साल बीत जाने के बाद गुनहगारों को सजा दिए बिना हमले के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि महज खानापुर्ति लगती है। इस मामले पर केन्द्र सरकार राजनिति कर रही है ।
13 दिसंबर २०११ को संसद हमले की बरसी पर पूरा भारत उन शहीदों को नमन कर रहा है, जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी।



चरनदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181

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Tuesday, December 06, 2011

काले धन व भष्ट्राचार पर रोक लगाने के लिये चाबुक क्यो नहीं चलाती सरकार | 


सरकार की फ़ेसबुक व सोशल नेट्वर्किंग साइट टिवटर पर प्रतिबंध लगाने की मन्शा उसकी आपातकाल के दौरान लायी गयी सेन्सरशिप की मानसिक्ता को उजागर करती है | मै सरकार के नज़रिये से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ | सरकार इस फ़ैसले के जरिये अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करना चाहती है, ये कोई राज तंत्र नही है की, सरकार के खिलाफ बोलना जुर्म हो | अगर नेता जनता के अनुकूल काम नहीं करे तो उनका विरोध तो होगा ही, वरना राजा कलमाड़ी जैसे लोग जनता के धन को लुट कर दुसरे देशो में जमा कर आयेंगे| यदि किसी राजनेता के बारे में कोई सत्य विधयमान है तो वह सामने आना ही चाहिए पर राजनेता ऐसा नहीं चाहते | 
सरकार के पास इन साइटो पर आपत्तिजनक कटेंट आने पर रोकने के लिये पहले से ही सुचना प्रौद्योगिकी के तहत कानुन मौजुद है| सरकार इन सब पर सेन्सर लगाने के बजाय काले धन व भष्ट्राचार पर रोक लगाने के लिये चाबुक क्यो नहीं चलाती ? लोकपाल जैसे मुद्दो पर मौन व्रत क्यों रखती है ? अगर भारत सरकार ऐसा करती है तो भारत ओर पाकिस्तान मे कोई अंतर नही रह जाएगा |





चरनदीप अजमानी , पिथोरा 
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Saturday, November 05, 2011




( अपने स्वार्थ से परे सोचने की जरुरत )


मेरे घर के पास ही कल एक सडक हादसे मे मेरे एक करीबी मित्र की लडकी की मौत ने मुझे तोड कर रख दिया। कल दिन भर मैं इसी चिन्तन मे डुबा रहा कि क्यों हम अपने आसपास होने वाली दुसरो की लापरवाही का विरोध नही करते ? क्यों हम इसे एक सामान्य हाद्सा मानकर उसको रोकने की पुरी जिम्मेवारी प्रशासन पर डाल कर चुप रह जाते है? जब प्रशासन खुद आंख मुंद कर दुर्घट्ना को रोकने के लिये कोइ सार्थक प्रयास ना करे तो मुझे सुनील कुमार जी का यह सन्देश बिल्कुल उचित लगता है कि कानुन अपने हाथ में ले और दोषियो को रोककर खुद सजा दे ,क्योंकि प्रशासन में काम करने वाले अपनी आत्मा, इमान का सौदा कर केवल वहीं ध्यान देते है जहां इनको लाभ दिखे। जनप्रतिनिधि भी अपनी वहीं रोटियां सेकतें है जहां आंच हो ?


इस पत्र के माध्यम से सडक विभाग की देखरेख का जिम्मा संभालने वाले अधिकारिओं से मै पुछना चाहता हुं, की उनके बच्चे जब इस तरह के हादसे मे पीडित हो तो तब भी वो ऐसा ही गैर जिम्मेंदाराना रवैया अपनाएंगे ? जिस जगह पर ये हादसा हुआ वहां पर चारो ओर से आवजाही होती है किन्तु कभी प्रशासन ने सडक अवरोधक बनाने के लिये ध्यान नही दिया। सडकें खराब, सडक-परिवहन विभाग खराब, आर.टी.ओ. खराब। रिश्वत लेकर अयोग्य आदमी को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया जाता है कम उम्र के नौसिखिये बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाडी चला रहे है। प्रशासन चन्द पैसे इनसे लेकर इन्हे और खुली छूट दे रहा है अच्छा कानुन है इस देश का ? खुद शराब पीकर ड्राइव कर रहे हैं, दूसरी गाडियों को पीछे छोडने के अहंकार में गाडी तेज चला रहे हैं, ओवरटेक कर रहे हैं, यातायात-नियम तोड रहे हैं। चाहे किसी की जान चली जाये । लेकिन अब शायद इन सवालों का उनके लिये कोई मायने नहीं है ,जानेवाले मासूम बच्चे ,माएं, भाई-बहन और पिता लौट्कर नही आने वाले। नागरिकों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने की चिंता शायद किसी को नहीं है। अफसोस इस बात का है कि जो दुर्घटना होती है उसका दर्द, विकलांगपन, बच्चों का, अनाथपन, स्त्रियों का वैधव्य आजीवन होता है आश्रितों की जिंदगी बर्बाद हो जाती हैं.
उससे भी अफसोस की बात है कि इस घटना के होने के बावजुद प्रशासन व नागरिक अपने स्वार्थ से परे नहीं सोचेंगे । 


चरनदीप अजमानी , पिथौरा 
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Monday, October 31, 2011

( महगांई )


माननीय प्रधानमंत्री जी
महगांई बढने पर आप हर रोज़ चिंता जताते है
पर क्यों बढ रही है ?
इसका जवाब जनता को क्यों नहीं दे पाते है ?


चरनदीप अजमानी, पिथौरा 
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Wednesday, October 26, 2011

मेरे घर पर प्रज्वलित और तम से जूझता एक दीप

















हर तरफ़ छाई है खुशी , हर तरफ़ है खुशहाली
मोहब्ब्त का पैगाम लेकर , आयी है दीवाली

आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं । रोशनी और खुशी के इस पावन पर्व पर ईश्वर आपकी सारी मनोकामनाएँ पूरी करे और घर में सुख सम्पन्नता बरसाए। खूब पटाखे चलाइये, मिठाईयाँ खाईये और खुशी मनाइये।
शुभ दीपावली ।

चरनदीप अजमानी

Wednesday, October 19, 2011





अरविन्द केजरीवाल पर किया गया हमला लोक्त्तन्त्र पर हमला है । 
अरविन्द केजरीवाल का यह कहना यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी 
जब चाहें तब लोकपाल पारित हो सकता है, बिल्कुल सही है । 
वर्तमान समय मे भ्रष्टाचार के लिए भी कांग्रेस ही जिम्मेदार है,
क्योंकि वह सत्ता में हैं। 
यदि कांग्रेस चाहे तो देश से भ्रष्टाचार मिट सकता है। 
लोकतंत्र में इस तरह के कृत्य की जितनी निन्दा की जाये कम है।  
ऐसा नहीं होना चाहिए यदि किसी को किसी व्यक्ति से नाराजगी 
भी है तो उसे जाहिर करने का एक लोकतान्त्रिक तरीका है।  
हमारा सविधान हिन्सा के किसी भी तरीके की इज़ाज़त नही देता है।  
अरविन्द केजरीवाल व अन्ना हज़ारे  एक ऐसे कानुन बनाने के लिये प्रयासरत है, 
जिससे कि हम भ्रष्टाचार से पुरी तरह  निजात पा सके। 
एक भारतवासी होने के नाते मै इस हमले की निन्दा करता हू । 


चरनदीप अजमानी , पिथोरा 
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Monday, October 17, 2011

















चिठ्ठी ना कोई संदेस जाने वो कौन सा देस
जहाँ तुम चले गये
इस दिल पे लगाकर ठेस जाने वो कौन सा देश
जहाँ तुम चले गये


एक आह भरी होगी, हमने ना सुनी होगी
जाते जाते तुमने आवाझ तो दी होगी
हर वक़्त यही है गम, उस वक़्त कहाँ थे हम
कहां तुम चले गये


हर चीज पे अश्कों से लिखा है तुम्हारा नाम
ये रस्ते, घर, गलियाँ तुम्हे कर ना सके सलाम
हाय दिल में रह गई बात, जल्दी से छुडाकर हाथ
कहाँ तुम चले गये


अब यादोँ के कांटे इस दिल में चुभते हैं
ना दर्द ठहरता है ना आंसु रुकते हैं
तुम्हें ढुँढ रहा है प्यार, हम कैसे करें ईकरार
कि हाँ तुम चले गये





Sunday, August 21, 2011



















कृष्ण का प्रेम अद्वितीय है
( कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष )  
परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी

कृष्ण का ज्ञान, माधुर्य और प्रेम अद्वितीय था। किसी भी दृष्टिकोण से उनका व्यक्तित्व पूर्ण था और अनूठा था। यह बताता है कि यह सब गुण आपके अंतर तम में हैं ठीक उसी प्रकार से जैसे सूर्य की किरण में सभी रंग हैं।

पांडवों की माँ महारानी कुंती ने एक बार कृष्ण से कहा, "काश मेरे पास और अधिक परेशानियाँ होतीं। जब भी मैं किसी मुसीबत में थी, तुम हमेशा मेरे साथ थे। तुम्हारे साथ से मिलने वाला आनंद किसी और सुख सुविधा या आराम के आनंद से कहीं अधिक है। मैं कोई भी दुःख सह सकती हूँ। मैं तुम्हारी उपस्थिति के एक पल के बदले में इस दुनिया के सभी सुखों को छोड़ सकती हूँ।"

कृष्ण ने उनको आत्मज्ञान अधिक दिया - "मैं तुम्हारे अन्दर तुम्हारे स्वयं के रूप में ही हूँ। इस दुनिया में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मैं नहीं हूँ। लोग मुझे एक भौतिक शरीर के रूप में देखते हैं पर वे मेरे सच्चे स्वरुप को नहीं जानते। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - यह शरीर इन आठ तत्वों से बना है। मैं नौवा हूँ और इन सब से परे हूँ। मैं सर्वव्यापी हूँ। मूर्ख लोग यह नहीं जानते। उन्हें लगता है कि मैं एक मानव हूँ। हालांकि मैं शरीर में हूँ, परन्तु मैं शरीर नहीं हूँ। हालांकि मैं मन के माध्यम से काम कर रहा हूँ, परन्तु मैं मन नहीं हूँ। जैसा मैं तुम्हें दिखता हूँ वह मैं नहीं हूँ, अपनी ज्ञानेन्द्रियों से जितना तुम मुझे जान पायी हो उससे मैं कहीं अधिक हूँ। मैं तुम्हारे दिल में तुम्हारे स्वयं के ही रूप में उपस्थित हूँ और जब कभी भी तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी, मैं वहाँ रहूँगा। मैं तुरंत तुम्हारे पास आ जाऊँगा, तुमको सभी परेशानियों से बाहर निकालूँगा, तुम हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो।"

यहां तक कि संतजन भी कृष्ण के प्रेम में डूब गए। वैरागी जन भी उनकी ओर खिंचे चले जाते थे। कृष्ण शब्द का अर्थ है कि जो आकर्षक है, जो कि सब कुछ अपनी और खींचता है। हमारे अस्तित्व का अंतरतम स्तर ऐसा ही है - आत्मा का सुख और परमानंद कुछ ऐसा ही है। वह सब कुछ अपनी और आकर्षित करता है। कृष्ण के जन्म का प्रतीकवाद भी बहुत सुंदर है। देवकी - शरीर, वसुदेव - प्राण यानि सांस एक होकर कृष्ण - यानि भीतर के आनंद और खुशी को प्रकट करते हैं।

कृष्ण हमेशा नीले रंग में दर्शाये जाते हैं। इसका अर्थ है कि शरीर इतना पारदर्शी है, कि उसका अस्तित्व लगभग न के बराबर है। जो अनंत है उसे नीले से दर्शाया जाता है; आकाश नीला है, और समुद्र नीला है। खुद कृष्ण गीता में कहते हैं - "लोग मेरे सच्चे स्वभाव को नहीं जानते। कोई भी नहीं जानता।” उनके पूरे जीवन काल में केवल तीन लोग ही उनके सच्चे विराट स्वरुप को जान पाये। पहली यशोदा थीं, दूसरे अर्जुन और तीसरे व्यक्ति उनके बचपन के दोस्त उद्धव थे। वे गीता में कहते हैं, "लोग मुझे भौतिक रूप - एक शरीर के रूप में समझते हैं। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं चेतना हूँ जो सर्वव्यापी है और सब में मौजूद है।” वे आगे कहते हैं, "मैं चीनी में मिठास हूँ, मैं चाँद में चाँदनी हूँ, मैं धूप में गर्मी हूँ।" उन्होंनें अपने आप को “सर्वव्यापी” कहा ।
कृष्ण हमेशा एक पैर को जमीन पर मज़बूती के साथ जमा कर खड़े होते हैं, और उनका दूसरा पैर तिरछा रहता है जो कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह ज़मीन छू रहा है लेकिन वास्तव में वह नहीं छू रहा होता है। वह कहीं और है। इसे ‘त्रिभंगी’ मुद्रा कहा गया है। इसका तात्पर्य है जीवन में सम्पूर्ण संतुलन होना।

कृष्णा को माखन चोर कहा गया है। मक्खन दूध का अंतिम उत्पाद है। दूध में जामन डालने से दही जम जाती है और दही को अच्छी तरह से मथ कर मक्खन निकलता है। जीवन भी मंथन की एक प्रक्रिया है। आपके मन में भी बहुत सी बातों द्वारा मंथन हो रहा है - घटनाओं, परिस्थितियों और वाकयों से।

अंत में मक्खन निकलता है जो कि आपका सतचित स्वरुप है। और कृष्ण नवनीत चोर हैं – चितचोर हैं। इसका क्या अर्थ है? वह प्रेम करते हैं सच्चिदानंद स्वरुप से, वह उस चित से प्रेम करते हैं जो मक्खन जितना नरम हो, जो सख्त न हो। जब तुम्हारा मन ऐसा बन जाता है तब वे तुमको पसंद करने लगते हैं। इसका अर्थ है कि तब अनन्तता तुम्हारी ओर बढ़ने लगती है, वह तुमसे इतना प्यार करती है कि तुम्हारे चित को तुमसे किसी भी कीमत पर चुरा लेती है। वह तुम्हें ढूँढ रहे हैं। तुम जहाँ कहीं भी हो, भगवान आते हैं और तुम्हें ढूंढ लेते हैं।

कृष्ण सभी संभावनाओं के प्रतीक है, मानव के सभी कलाओं और दिव्यता के पूर्ण विकसित स्वरुप के प्रतीक हैं। वास्तव में कृष्ण के व्यक्तित्व को समझना बहुत मुश्किल है। ऋषियों ने उन्हें पूर्ण पुरुष और सभी कलाओं से सम्पन्न दिव्यता का एक सम्पूर्ण अवतार बताया है क्योंकि जो कुछ भी किसी मानव में हो सकता है वह सब कृष्ण में मौजूद है।

जन्माष्टमी वह दिन है जब आप अपनी स्वयं की चेतना में एक बार फिर कृष्ण के विराट स्वरूप को सजीव कर लेते हैं। अपने सत्य स्वरुप को अपने दैनिक जीवन में प्रकट करना ही कृष्ण जन्म का सच्चा रहस्य है।



संकलनकर्ता 
चरणदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181
Ajm.charan@gmail.com
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Wednesday, August 17, 2011

      















( गुलामी का बोझ )

उतार दो अन्ना जी ये गुलामी का बोझ 
देश गद्दारों के सर की सलामी का बोझ 

अन्ना जी  के जन लोकपाल की लड़ाई के समर्थन में  
समर्पित ये  पंक्तियाँ 


चरणदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181
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Sunday, July 17, 2011

( आतंकी फिर से छुट जाते है )  


हर हमले में हम टूट जाते है 
और आतंकी फिर से छुट जाते है 
बात होती है अब कार्यवाही होगी
आर पार की लड़ाई होगी 
पर ये सियासत है बहरी
और कानून है अँधा
इनके आश्वासन हमे हर बार लुट जाते है
और आतंकी फिर से छुट जाते है 

पहले जख्म का घाव भर नहीं पाता है 
दूसरा जखम तैयार हो जाता है
फिर  से उस जखम पर मरहम लगाने में 
हम जुट जाते है 
और आतंकी फिर से छुट जाते है 
हर हमले में हम टूट जाते है   
  
  
( मुंबई हमले में दिवंगत हुए शहीदों और 
पीड़ित परिवारों को समर्पित )
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Tuesday, July 05, 2011

बंटवारा

आँगन का टुकडो में बंटवारा हो गया 
भाई से ज्यादा भाई को पैसा प्यारा हो गया


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               ( मजबूर )

हालातों के आगे हम मजबूर हो गए 
ना चाहते हुए भी तुझसे दूर हो गए 

जो माँगा करते थे झुककर हुस्न खुदा से 
हुस्न जब मिल गया तो वो मगरूर हो गए


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           ( यादें ) 

भूली बिसरी यादें निकली 
जब भी तेरी बातें निकली 

खिली जख्म की फिर बगियाँ
दोस्तों की घातें निकली



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      ( चुनाव का मौसम )

चुनाव का मौसम आते ही 
यही बात 
समझा गया है  
पिता के लिए शराब, 
माँ के लिए कपडे 
और बच्चो के लिए
भोजन आ गया है


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           ( मयखाना )
दर्द भरा अफसाना लेकर बैठे है
टुटा दिल और पैमाना लेकर बैठे है
साकी तेरे जाम की अब तो तलब नहीं 
हम खुद ही मयखाना लेकर बैठे है


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             ( रिश्ते नाते )


रिश्ते नाते की बात अब बेमानी हो गयी 
इंसानी सभ्यता की यही कहानी हो गयी 

हरयाली भी खो गयी जंगल सारे कट गए
चह्चहाती चिडियों की नीड़ भी वीरानी हो गयी 



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                   ( सूरत )
किसी ने हमे मुड़कर देखा भी नहीं
क्या तमन्ना लेकर हमने सूरत संवारी थी 


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Monday, June 20, 2011





















( काश की हम भी पत्थर होते )

काश की हम भी पत्थर होते
ना दुःख होता ना हम रोते

बच्चो के खिलोने बन जाते
 घर घर हम भी पूजे जाते
कोई हमे दूर फेकता
कोई हमे पानी में डुबोता
पानी में भी डुबक डुबक कर
हम तो खूब ग़ोता लगाते  


काश की हम भी पत्थर होते
ना दुःख होता ना हम रोते


किसी मकान की नीव बन जाते
किसी  के घर का चुल्हा बन जाते
कोई हमसे फल को तोड़ता
कोई हमसे ठोकर खाता
कोई कीचड़ में हमे डालकर
अपने लिए एक राह बनाता
प्यार ही प्यार हम फैलाते
नफरत के यूँ बीज न बोते 


काश की हम भी पत्थर होते
ना दुःख होता ना हम रोते

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Tuesday, May 31, 2011

           चंद लाईने 

भूख पीड़ा बेबसी है 
मुश्किल बड़ी ये जिंदगी है

अमीरों के हाथो में क़ैद 
क्यों गरीबों की खुशी है

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                 चंद लाईने 

मेरी जिंदगी में जो उम्मीदे वफ़ा थे 
मुश्किलों के दौर में वो मुझसे  जुदा थे  


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Sunday, May 08, 2011

                  चंद लाईने 

हर  कदम पर् सहमी सहमी जिंदगी बनी रही
चराग जलाए हमने फिर भी तीरगी (अँधेरा) बनी रही
मुल्क के  एक गाँव में माह भर अँधेरा था 
संसद के गलियारे में रौशनी बनी रही  


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Thursday, April 14, 2011

                    चंद लाईने 

सपनो में भी मिल ना सके  अल्लाह और राम 
मज्हबो में अब यारो इतना फासला हुआ  

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Wednesday, April 13, 2011

                  चंद लाईने  

जुल्म से लड़ने का अगर हौसला होता 
चिरागों से रोशन यहाँ हर मकाँ होता 



चरणदीप अजमानी, पिथोरा 9993861181 
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Tuesday, April 12, 2011

               चंद लाईने    

जीवन का चेहरा भी कितना अच्छा होता
हर इंसान अगर यहाँ पर सच्चा होता



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             चंद लाईने 

रिस्तो में इसीलिए हो जाती है दुरी 
अपने ही चलाते है जब गर्दन पे छुरी
जितनी चादर हो उतने ही पांव फैला
हर खवाहिश इंसान की कब होती है पूरी 

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Friday, March 25, 2011

           ( व्यथित लोकतंत्र ) 

अब तो प्रशाशन का ,यही मूलमंत्र है  
भ्रष्ट सारा तंत्र यहाँ, व्यथित लोकतंत्र है  

जांच कमेटी बने,आंच नहीं आये पर 
जनता के नाम का,ये कैसा प्रजातंत्र है 

जीत जाती बेईमानी,हारती इमानदारी
आदमी के हाथो अब,आदमी परतंत्र है

कैसे सुराज आये,कैसे रामराज्य आये 
 नेताओं के हाथो की,संसद बनी यन्त्र है 


चरणदीप अजमानी, पिथोरा 
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Monday, March 14, 2011

भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की पुण्य तिथि पर विशेष


 ( भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की पुण्य तिथि पर विशेष ) 

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) क्रान्तिकारी परिवार में हुआ था । हालांकि  उनका पैतृक निवास  भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह पर  गहरा प्रभाव डाला था।भगत सिंह ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की थी । भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की भी स्थापना की थी 
गांधीजी के असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गांधीजी के तरीकों और हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे । गांधीजी के असहयोग आन्दोलन को स्थगित  करने  कि  वजह से उनमे एक रोश्  पैदा हुआ और  उन्होंने 'इंकलाब और देश कि स्वतन्त्रता के लिए हिंसा का मार्ग अपनाया 

१९२८ में साईमन कमीशन के पुरे भारतवर्ष में बहिष्कार  हुए । इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज  किया । इसी लाठी चार्ज में चोट लगने  की वजह से   लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई । इसका बदला लेने के लिए   इन्होंने पुलिस सुपरिंटेंडेंट सैंडर्स को मारने की सोची । सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु सैंडर्स के घर के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे । उधर बटुकेश्वर दत्त अपनी साईकल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो । दत्त के इशारे पर दोनो सचेत हो गए । उधर चन्द्रशेखर आज़ाद छिपे कर  इनके घटना के अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे । सैंडर्स के आते ही राजगुरु ने  गोली उसके सर में मारी  इसके बाद भगत सिंह ने  गोली दाग कर लाला लाजपत राइ की मृत्यु का बदला अंग्रेजी शाशन से ले लिया 


वे मार्क्स के सिद्धांतो  तथा समाजवाद से प्रभावित थे । इस कारण से उन्हें पूंजीपतियों कि मजदूरों के प्रति शोषण की आलोचना की   । ऐसा करने के लिए उन लोगों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची ।बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल १९२९ को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए' बम और पर्चे फेंके । निश्चित रूप से भगत सिंह और उनके साथियों में जोश और जवानी चरम सीमा पर थी। राष्‍ट्रीय विधान सभा में बम फेकने के बाद चाहते तो भाग सकते थे किन्‍तु भारत माता की जय बोलते हुऐ फाँसी की बेदी पर चढ़ना मंजूर किया 
उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ। जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की।
२३ मार्च १९३१ को भगत सिह तथा इनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फांसी से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे ।  जब जेल के अधिकारियों ने उनसे कहा कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा - 'रुको एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है' 
गांधीगीरी वाली मानसिकता आज के भारत सरकार में विद्यमान है, आज भी यह प्रशन  है की भारत रत्न सम्मान से  अनेकों  सेनानी वचिंत क्यों  है  सरकार चाहती तो यह सम्मान  सेनानियों को दिया जा सकता था। किन्तु अंग्रेजी शाशन की मानसिकता वाली सरकार भला क्यों चाहेगी  की यह सम्मान भगत सिंह को मिले 
आज इस पावन अवसर पर शहीद भगत सिंह को  दिल से याद  करना और उनके आदशों ही अपनाना उनको असली भारत रत्न मिलने से कहीं बढ़कर होगा ।
भगत सिंह का लिखा यह  गीत उनकी हमेशा याद दिलाता  रहेगा</span>

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।


चरणदीप अजमानी, पिथोरा 9993861181
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Sunday, March 13, 2011























( पेड से  पत्ता टूटा )

पल भर मे वो ऐसा रुठा 
पेड से जैसे पत्ता टूटा


तेरे जाने के बाद से
हम पर दुख का पर्वत टुटा


सच का ये अंजाम पुराना
ज़ीता फिर मुकदमा झुठा


देश मेरा सोने कि चिडिया
ज़िसने चाहा जी भर लुटा


ग़ुलशन का क्या हाल बताये
ज़ाने पत्ता पत्ता बुटा




चरणदीप अजमानी, पिथोरा 9993861181
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Saturday, February 19, 2011


           









        


           ( वतन बचाने आ जाओ )

खवाब जो देखे थे पहले उसे सजाने आ जाओ 
भगत सुखदेव राजगुरु वतन बचाने आ जाओ

राम नाम के भेष  में अब तो रावण छिप कर बैठा है 
बन गयी लंका अब फिर से उसे जलाने आ जाओ
भगत सुखदेव राजगुरु वतन बचाने आ जाओ 

शहीदों की शहादत को यह देश भूल कर बैठा है 
रहबर रहजन बन बैठे राह दिखाने आ जाओ
भगत सुखदेव राजगुरु वतन बचाने आ जाओ 

आज़ादी का जो सपना तुमने बचपन में देखा था
एसेम्बली में जो तुमने बहरो के लिए बम फेंका था 
इन्कलाब का नारा फिर से याद दिलाने आ जाओ 
भगत सुखदेव राजगुरु वतन बचाने आ जाओ 
  

चरणदीप  अजमानी पिथोरा 9993861181
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Monday, February 14, 2011













( वेलेंटाइन डे का त्यौहार )


मेरे मित्र ने पूछा  
वेलेंटाइन डे का त्यौहार कब आता है

क्यों हमको पता नहीं चल पाता है
तुझसे भी मेरा पुराना नाता है 
तो तुझे बताने में क्या जाता है 
मैंने कहा रे पगले 
इसे जान्ने की एक विधि है 
जो मैंने इन पांच सालो में सीखी है
सुबह से जब शेअर बाज़ार गुलाब का भाव बतलाये 
और एस एम् एस मोबाइल पर झनझनाए
दो रूपए के गुलाब फुल बीस में 
बिकने लगे
रेस्तरा में ज्यादा कपल दिखने लगे  
गिफ्ट कॉर्नर पर भीड़ बड़ी हो 
पार्क के बाहर गाडिया खड़ी हो 
लड़की धीमे से मुस्कुराए
लड़के की नज़र लड़की पर गडी हो
दोनों खूब सज धज कर हो तैयार
उनके हर एक लफ्ज में हो प्यार ही प्यार 
तो समझ लेना आज ही है 
वेलेंटाइन डे का त्यौहार 




चरणदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181
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Saturday, February 12, 2011





















( वेलेंटाइन डे अनुचित )

पिछले कुछ सालो से वेलेंटाइन डे का जबरदस्त 
प्रचार देखने को मिला है
मेरे नजरिये से ये बिलकुल अनुचित है 

प्यार एक ऐसा रिश्ता है जिसे लम्हों, पल ,
समय ,दिन या तारीख पर बांधना ठीक नहीं
वेलेंटाइन डे बाजारवाद की पैदा की हुई तारीख है .

प्रेम जो की एक सहज भाव है जो आपको माता-पिता,
भाई,बहन, गुरू किसी से भी हो सकता है
और समय के साथ बदल सकता है .

भविष्य के लिए किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता 
बाद में बंधन ,तनाव बन जाती है और यही वेलेंटाइन डे
की उपज है आज वेलेंटाइन डे का प्रेम 
अर्थशाष्त्र के नियम की तरह हो गया है
जबकि इसे समझने के लिए सम्वेंदनशीलता की जरुरत है .
आप कभी प्रकृति और जीवन से प्रेम करके देखे 

तो पता चले की वास्तविक प्रेम क्या है .
भारतीय संस्कृति के लोग अगर पश्चिम के 

अनुसार चले तो पहुचेगे कहाँ पर
हमे 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे मनाने के बजाय 

माता-पिता पूजन दिवस मनाना चाहिए
हम वेलेंटाइन डे पर माता पिता को पूजे 

जो हमारे जीवन को प्रेम्मय बनाते है
 

श्री श्री रविशंकर ने कहा भी है
प्रेम को प्रेम ही रहने दो इसे कोई नाम ना दो


चरणदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181
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Tuesday, February 08, 2011

पावन बसंत की बेला
















पावन बसंत की बेला

कोयल कूंके डाल डाल पर, उडे कीट पंतगा 
मन कर ता अठ्खेलिया, मौसम मस्त मतंगा


मंद मंद बहती बयार, पुष्प उठे है खिल
मीठी वाणी, मीठे स्वर से, एक दुजे से मिल


महकी दसों दिशाएं, ढोल की मीठी धुन
आम्र्मंजरी चहक रही, आया अब फ़ागुन

नयी उमंगें, नयी चेतना, नवगीत हर्षाये 
पावन बसंत की बेला पर, वाग्देवी विद्या बरसाए  

चरणदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181
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