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Thursday, January 27, 2011

















( नये दौर का चलन )

नये दौर का चलन हो गया 
फुल का दुश्मन चमन हो गया


मुफलिस की मज़बूरी देखो 
दो कौड़ी का बदन हो गया 


जलना भी है गलना भी है
हमको यह भी सहन हो गया


अश्क आँख से टपक रहे है
खुश फिर कैसे वतन हो गया


चरण बनो तुम खुद ही दीपक 
अन्धकार अब गहन हो गया 


चरणदीप अजमानी, पिथौरा  9993861181
Ajm.charan@gmail.com
Ajmani61181.blogspot.com 
 


 

1 comment:

  1. मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण अच्छी रचना . बधाई . मेरा सुझाव है कि आप अपनी रचनाओं के शीर्षक भी देवनागरी लिपि में प्रकाशित करें.हेडर कुछ और बेहतर बना सकें तो और भी बेहतर होगा. वैसे शुरुआत बहुत अच्छी है. शुभकामनाएं .

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