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Sunday, December 25, 2011

(नये साल कि ख्वाहिशें )


जिंदगी के हम पे यारो, कुछ तो कम एहसान हुए,
अपनों के हाथो अपनों की महफ़िल में नीलाम हुए  

पंडित ने क्यों आँखे मुंदी ,क्यों मुल्ला नहीं चिल्लाया,
मजहब के नाम पे यारो ,जब भी कत्लेआम हुए   

मेरे नाम पे धोखा क्यों, मेरी मौत को नहीं हुआ,
वैसे तो  मेरी बस्ती में, मेरे भी हमनाम हुए 
 


उन बच्चों से जाकर पुछो, नये साल कि  ख्वाहिशें ,
भुख मिटाने मे गुम, जिनके दिन रात तमाम हुए


चरनदीप अजमानी, पिथौरा, 9993861181
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Wednesday, December 21, 2011















( जनवादी कवि अदम गोंडवी को श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा श्रध्दाजंलि )

''काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में ''

जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले देश के ख्याति प्राप्त जनवादी कवि अदम गोंडवी नही रहे। हिन्दी गजलों के ‘गजलराज’ रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी हमेशा दबे कुचले लोगों की ‘आवाज’ बने। गोंडवी लगातार समाज की तल्ख सच्चाइयों को गजल के माध्यम से लोगों के सामने रखते रहे और कागजों पर चल रही व्यवस्थाओं की पोल खोलते रहे। संवेदन हीन सरकार उनका इलाज तक नही करवा पाई। निसंदेह अदम जी का निधन साहित्य में बड़ी क्षति है। "श्रृंखला साहित्य मंच" पिथौरा द्वारा उन्हे भावभीनी श्रध्दाजंलि अर्पित की गई। श्रध्दाजंलि सभा में प्रमुख रुप से सर्वश्री पी. के. सच्चिदानंदन, एस.के.ड्ड्सेना, उमेश दीक्षित, अनुप दीक्षित, दिनेश दीक्षित, शिवा महान्ती, सन्तोष गुप्ता, एस. के. नीरज , चरनदीप अजमानी, निर्वेश दीक्षित, एफ़. ए. नन्द उपस्थित थे

Friday, December 16, 2011





सर्वप्रथम मेजर ध्यानचंद को मिले भारत रत्न  

देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न  1954 में शुरू किया गया था  तब से अब तक 41 लोगों को इससे नवाजा जा चुका है  आमतौर पर भारत-रत्न उन लोगों को मिलता है, जिनका भारत के लिए अतुलनीय और निरपेक्ष योगदान रहा है  भारत रत्न सम्मान देने के नियमो में ऐसा उल्लेख नहीं था की यह सम्मान किसी खिलाड़ी को भी दिया जा सकता है,किन्तु अब सरकार द्वारा नियमो में संशोधन के बाद यह मांग उठने लगी है की यह सम्मान क्रिकेट के भगवान् सचिन रमेश तेंदुलकर को दिया जाना चाहिए  परन्तु मै मीडिया द्वारा प्रचारित इस भावनाओं से सहमत नहीं हूँ  अगर खेल से ही किसी खिलाड़ी को भारत रत्न दिया जाना है, तो सर्वप्रथम मेजर ध्यानचंद को यह सम्मान दिया जाना चाहिए  

तीन ओलंपिक 1928, 1932 और 1936 में स्वर्ण पदक जीतने वाले करिश्माई सेंटर फारवर्ड ध्यानचंद को यह पुरूस्कार हमारे राष्ट्रीय खेल और मेजर ध्यानचंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि  होगी  उनके जन्मदिन को भारत  का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा 


सचिन से पूर्व और भी ऐसे खिलाड़ी है जो अपने खेल प्रदर्शन के दृष्टिकोण से इस सम्मान के दावेदार है  के. डी. जाधव ,लिएन्डर पेस, कर्णम मल्लेश्वरी,  राज्यवर्धन सिंग राठोर, अभिनव बिन्द्रा, सुशिल कुमार. विजेन्दर सिंग को भला हम कैसे भूल सकते है जिन्होंने ओलंपिक में पदक जीतकर भारत का नाम पुरे विश्व में फैलाया  सचिन अभी देश के लिए खेल रहे है और उनके रिटायर होने के पूर्व यह सम्मान उन्हें दिया जाना दुसरे खिलाडियो के मन में नकारात्मक सन्देश का प्रचार करेगा, जिन्होंने अपने अपने खेल के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया है 


चरनदीप अजमानी, पिथौरा 
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Monday, December 12, 2011

















( संसद हमला: शहीदों की शहादत के साथ मजाक )

13 दिसम्बर २०११ को संसद पर हमले के दस साल पूरे हो रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र की आन-बान-शान संसद भवन की आतंकी हमले से रक्षा में 9 लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी पर किसी भी सांसद पर आंच नहीं आने दी पर लगता है संसद पर हुए हमले के दौरान शहीद हुए सैनिक भुला दिये गये है हमले के बाद अफजल गुरु को इस मामले में दोषी पाया गया और उसे फांसी की सजा सुनाई गई है।
 लेकिन इस पर अमल नहीं हो सका है ,क्योंकि अफजल गुरू की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है| उसे फांसी दिलवाने की खातिर शहीदों के घर वालों ने बहादुरी के तमगे भी लौटा दिए है | फिर भी इंसाफ पाने का उनका इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ है |सुप्रीम कोर्ट से सजा की पुष्टि के बावजूद अफजल को फांसी क्यों नहीं दी जा रही है इस हमले पर अगर देश के सांसदो की जान चली गयी होती तो शायद ज्यादा अच्छा होता। दस साल बीत जाने के बाद गुनहगारों को सजा दिए बिना हमले के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि महज खानापुर्ति लगती है। इस मामले पर केन्द्र सरकार राजनिति कर रही है ।
13 दिसंबर २०११ को संसद हमले की बरसी पर पूरा भारत उन शहीदों को नमन कर रहा है, जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी।



चरनदीप अजमानी, पिथौरा 9993861181

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Tuesday, December 06, 2011

काले धन व भष्ट्राचार पर रोक लगाने के लिये चाबुक क्यो नहीं चलाती सरकार | 


सरकार की फ़ेसबुक व सोशल नेट्वर्किंग साइट टिवटर पर प्रतिबंध लगाने की मन्शा उसकी आपातकाल के दौरान लायी गयी सेन्सरशिप की मानसिक्ता को उजागर करती है | मै सरकार के नज़रिये से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ | सरकार इस फ़ैसले के जरिये अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करना चाहती है, ये कोई राज तंत्र नही है की, सरकार के खिलाफ बोलना जुर्म हो | अगर नेता जनता के अनुकूल काम नहीं करे तो उनका विरोध तो होगा ही, वरना राजा कलमाड़ी जैसे लोग जनता के धन को लुट कर दुसरे देशो में जमा कर आयेंगे| यदि किसी राजनेता के बारे में कोई सत्य विधयमान है तो वह सामने आना ही चाहिए पर राजनेता ऐसा नहीं चाहते | 
सरकार के पास इन साइटो पर आपत्तिजनक कटेंट आने पर रोकने के लिये पहले से ही सुचना प्रौद्योगिकी के तहत कानुन मौजुद है| सरकार इन सब पर सेन्सर लगाने के बजाय काले धन व भष्ट्राचार पर रोक लगाने के लिये चाबुक क्यो नहीं चलाती ? लोकपाल जैसे मुद्दो पर मौन व्रत क्यों रखती है ? अगर भारत सरकार ऐसा करती है तो भारत ओर पाकिस्तान मे कोई अंतर नही रह जाएगा |





चरनदीप अजमानी , पिथोरा 
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Saturday, November 05, 2011




( अपने स्वार्थ से परे सोचने की जरुरत )


मेरे घर के पास ही कल एक सडक हादसे मे मेरे एक करीबी मित्र की लडकी की मौत ने मुझे तोड कर रख दिया। कल दिन भर मैं इसी चिन्तन मे डुबा रहा कि क्यों हम अपने आसपास होने वाली दुसरो की लापरवाही का विरोध नही करते ? क्यों हम इसे एक सामान्य हाद्सा मानकर उसको रोकने की पुरी जिम्मेवारी प्रशासन पर डाल कर चुप रह जाते है? जब प्रशासन खुद आंख मुंद कर दुर्घट्ना को रोकने के लिये कोइ सार्थक प्रयास ना करे तो मुझे सुनील कुमार जी का यह सन्देश बिल्कुल उचित लगता है कि कानुन अपने हाथ में ले और दोषियो को रोककर खुद सजा दे ,क्योंकि प्रशासन में काम करने वाले अपनी आत्मा, इमान का सौदा कर केवल वहीं ध्यान देते है जहां इनको लाभ दिखे। जनप्रतिनिधि भी अपनी वहीं रोटियां सेकतें है जहां आंच हो ?


इस पत्र के माध्यम से सडक विभाग की देखरेख का जिम्मा संभालने वाले अधिकारिओं से मै पुछना चाहता हुं, की उनके बच्चे जब इस तरह के हादसे मे पीडित हो तो तब भी वो ऐसा ही गैर जिम्मेंदाराना रवैया अपनाएंगे ? जिस जगह पर ये हादसा हुआ वहां पर चारो ओर से आवजाही होती है किन्तु कभी प्रशासन ने सडक अवरोधक बनाने के लिये ध्यान नही दिया। सडकें खराब, सडक-परिवहन विभाग खराब, आर.टी.ओ. खराब। रिश्वत लेकर अयोग्य आदमी को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया जाता है कम उम्र के नौसिखिये बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाडी चला रहे है। प्रशासन चन्द पैसे इनसे लेकर इन्हे और खुली छूट दे रहा है अच्छा कानुन है इस देश का ? खुद शराब पीकर ड्राइव कर रहे हैं, दूसरी गाडियों को पीछे छोडने के अहंकार में गाडी तेज चला रहे हैं, ओवरटेक कर रहे हैं, यातायात-नियम तोड रहे हैं। चाहे किसी की जान चली जाये । लेकिन अब शायद इन सवालों का उनके लिये कोई मायने नहीं है ,जानेवाले मासूम बच्चे ,माएं, भाई-बहन और पिता लौट्कर नही आने वाले। नागरिकों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने की चिंता शायद किसी को नहीं है। अफसोस इस बात का है कि जो दुर्घटना होती है उसका दर्द, विकलांगपन, बच्चों का, अनाथपन, स्त्रियों का वैधव्य आजीवन होता है आश्रितों की जिंदगी बर्बाद हो जाती हैं.
उससे भी अफसोस की बात है कि इस घटना के होने के बावजुद प्रशासन व नागरिक अपने स्वार्थ से परे नहीं सोचेंगे । 


चरनदीप अजमानी , पिथौरा 
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Monday, October 31, 2011

( महगांई )


माननीय प्रधानमंत्री जी
महगांई बढने पर आप हर रोज़ चिंता जताते है
पर क्यों बढ रही है ?
इसका जवाब जनता को क्यों नहीं दे पाते है ?


चरनदीप अजमानी, पिथौरा 
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