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Monday, March 14, 2011

भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की पुण्य तिथि पर विशेष


 ( भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की पुण्य तिथि पर विशेष ) 

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) क्रान्तिकारी परिवार में हुआ था । हालांकि  उनका पैतृक निवास  भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह पर  गहरा प्रभाव डाला था।भगत सिंह ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की थी । भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की भी स्थापना की थी 
गांधीजी के असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गांधीजी के तरीकों और हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे । गांधीजी के असहयोग आन्दोलन को स्थगित  करने  कि  वजह से उनमे एक रोश्  पैदा हुआ और  उन्होंने 'इंकलाब और देश कि स्वतन्त्रता के लिए हिंसा का मार्ग अपनाया 

१९२८ में साईमन कमीशन के पुरे भारतवर्ष में बहिष्कार  हुए । इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज  किया । इसी लाठी चार्ज में चोट लगने  की वजह से   लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई । इसका बदला लेने के लिए   इन्होंने पुलिस सुपरिंटेंडेंट सैंडर्स को मारने की सोची । सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु सैंडर्स के घर के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे । उधर बटुकेश्वर दत्त अपनी साईकल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो । दत्त के इशारे पर दोनो सचेत हो गए । उधर चन्द्रशेखर आज़ाद छिपे कर  इनके घटना के अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे । सैंडर्स के आते ही राजगुरु ने  गोली उसके सर में मारी  इसके बाद भगत सिंह ने  गोली दाग कर लाला लाजपत राइ की मृत्यु का बदला अंग्रेजी शाशन से ले लिया 


वे मार्क्स के सिद्धांतो  तथा समाजवाद से प्रभावित थे । इस कारण से उन्हें पूंजीपतियों कि मजदूरों के प्रति शोषण की आलोचना की   । ऐसा करने के लिए उन लोगों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची ।बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल १९२९ को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए' बम और पर्चे फेंके । निश्चित रूप से भगत सिंह और उनके साथियों में जोश और जवानी चरम सीमा पर थी। राष्‍ट्रीय विधान सभा में बम फेकने के बाद चाहते तो भाग सकते थे किन्‍तु भारत माता की जय बोलते हुऐ फाँसी की बेदी पर चढ़ना मंजूर किया 
उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ। जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की।
२३ मार्च १९३१ को भगत सिह तथा इनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फांसी से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे ।  जब जेल के अधिकारियों ने उनसे कहा कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा - 'रुको एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है' 
गांधीगीरी वाली मानसिकता आज के भारत सरकार में विद्यमान है, आज भी यह प्रशन  है की भारत रत्न सम्मान से  अनेकों  सेनानी वचिंत क्यों  है  सरकार चाहती तो यह सम्मान  सेनानियों को दिया जा सकता था। किन्तु अंग्रेजी शाशन की मानसिकता वाली सरकार भला क्यों चाहेगी  की यह सम्मान भगत सिंह को मिले 
आज इस पावन अवसर पर शहीद भगत सिंह को  दिल से याद  करना और उनके आदशों ही अपनाना उनको असली भारत रत्न मिलने से कहीं बढ़कर होगा ।
भगत सिंह का लिखा यह  गीत उनकी हमेशा याद दिलाता  रहेगा</span>

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।


चरणदीप अजमानी, पिथोरा 9993861181
Ajm.charan@gmail.com
Ajmani61181.blogspot.com


 
 

4 comments:

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